सबूत

सूरज से माँगा है सबूत बता की कित्ते ग्रह रोशन किये अहं कहाँ दुष्टों के जलाये कहाँ दफ़न किये चाँद से कभी सवाल किये कित्ते आशिक़ आज बना दिए आस के दीये कित्ते जल रहे कित्ते सुलग गये कोयल से पूछा कभी गीत कितने गा लिये भेद कैसन सुलझा लिये हमसे फिर सवाल करने की … Continue reading

फ़र्क़

फ़र्क़ बस इतना ही था आप फ़सल तहसनहस करना बरबाद कर देना जानते हो हम हल चलाना बीज बोवना ऊगती फ़सल की परवरिश कमज़ोर बूटों को सहारा फल बटोरना आबाद करना मिलबाँट खाना ख़ूब जानते हैं। आप तबाह करते रहे हम आबाद! (Translation) 5.10.2014 Sukhmani Niwas, Tarn Taran Punjab 10:30 AM

बंदा ना सुधरेगा

यह तो आज ही पता लगता है फिर याद यह दिलाया जाता है की “सच्च” को भी जीतने के लिए “झूठ” से फ़रेब करना पड़े है तनिक मक्कार होना पड़े है! यह तो खुदा ही जाने की झूठ क्या और सच क्या मैं जब भी मिलता हूँ सच से औ झूठ से दोनों को “हम … Continue reading

सचु हारि कमावै झूठ

सच्च को मैंने भांपा नहीं झूठ अभी भी त्यागा नहीं क़दम एक उदासी चला नहीं मन आसनिरासि हुआ नहीं क्या जानूँ क्या सच होवे है और ना स्यानूँ झूठ। कौन किस पे हारिया किस वारिया कै डारिया किस छलिया अहं जालिया परतपालिया सुहागनाविया झूठ ना बोले झूठ रे लोगो सचु हारि कमावै झूठ। मुबारक? अफ़सोस?

Sing on Pablo Casals

Sing on PabloCasals “Peace! Peace! Peace!” Play along your “Song of the Birds” as a bonded resilient bird. A pity, freedom hasn’t dawned upon womenkind as yet Mind is still greed shackled Conceited ignorance imbued as yet. I sung with u, I play with u!

Answers

When venturing out to seek answers and truth, remember to leave your questions, and all of your queries home alone. Of finite means and of limited measures, a Being is simply incapable to carry their burden at one time both —of all question marks —of all exclamation marks. If contemplation, an ability to reason, being … Continue reading

सवाल – जवाब

जवाब लेने जब जाते हो ना बरखुरदर सवाल घर पे ही छोड़ के जाया करो। बंदा बहुत सीमित सा होवे है एक साथ सवालों और जवाबों का बोझ उठाने के असमर्थ है। और हाँ बिचार और बंदगी करने का गर चाउ चड पड़े सवालोजवाब दोनो से ही मुक्ति पानी होगी तुम्हें! हर सवाल किया नहीं … Continue reading

हक़

मैं डाँटता हूँ मुझे डाँटते हो डाँटता क्यों हूँ? सिर्फ़ इस लिए की तुम अकल से हो साक्षर अर ज़ुबानी हो की तुम हमपे ही सवाल करने का हक़ समझलोगे?

ਅਪਮਾਨ

ਮਾਨ ਦਾ ਪੁੱਠਾ ਨਾਮ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ. ਮਨ ਮਰਿਆਂ ਤੇ ਮਾਨ ਬਣਦੈ ਭ੍ਰਮ ਪਿਆਂ ਤੇ ਮਨ ਲੁੜਕਦਾ ਭਟਕਦਾ ਭੜਕਦਾ ਮਾਇਆ ਆਣ ਡੰਗ ਮਾਰਨ ਤੇ ਮਨ ਮਾਨ ਕਰਦੈ ਤੇ ਅਪਮਾਨ ਸੰਭਵਦਾ

ਜੱਦੀ ਗਿਆਨ ਦੀ ਇੱਕ ਪੁੜੀ

ਜੱਦੀ ਗਿਆਨ ਦੀ ਇੱਕ ਪੁੜੀ ਹਉਮੈਂ ਤੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਕਿ ਅੰਤਰਾ ਹੁੰਦੈ? ਬਜ਼ੁਰਗ ਕਹਿੰਦੇ ਸਨਗੇ ਹਉਮੈਂ ਹੁੰਦੀ ਐ ਹਾਂ-ਮੈਂ! ਹਾਂ-ਮੈਂ! ਤੇ ਨਾਮ ਹੁੰਦੈ ਨਾਂ-ਮੈਂ! ਨਾਂ-ਮੈਂ! ਤੇ ਹੁਣ ਮੇਰੇ ਯਾਰੋ ਮਾਪੋ ਅਪੁਣੇ ਆਪੁ ਨੂੰ ਤੇ ਫੇ ਸਭਨਾ ਰਿਸ਼ਤਿਆਂ ਅਰ ਠੇਕੇਦਾਰਾਂ ਨੂੰ ਭਾਂਵੇਂ ਓਹੁ ਧਰਮੀਂ ਹੋਵਣ ਜਾਂ ਦੁਨਿਆਵੀ।